Tuesday, June 29, 2010

नहीं रहे मशहूर पहलवान चंदगीराम

अपने जमाने के दिग्गज पहलवान और बैंकाक एशियाई खेलों [1970] के स्वर्ण पदक विजेता मास्टर चंदगीराम का मंगलवार को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। पारिवारिक सूत्रों ने बताया कि पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे चंदगीराम को सुबह अपने अखाड़े में ही दिल का दौरा पड़ा। वह 72 साल के थे। उनके परिवार में बेटा जगदीश कालीरमन और बेटी सोनिका कालीरमन हैं जो अंतरराष्ट्रीय स्तर के पहलवान हैं। हरियाणा के हिसार जिले में 1937 में जन्में चंदगीराम ने शुरू से ही कुश्ती को अपना लिया था और एशियाई खेलों के स्वर्ण पदक के अलावा उन्होंने कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीते। वह हिंद केसरी, भारत केसरी और रुस्तम-ए-हिंद भी बने। उन्होंने बाद में युवा पहलवानों को तैयार करने का बीड़ा उठाया और उनके चंदगीराम अखाड़े ने देश को कई नामी पहलवान दिए। भारत सरकार ने उनकी उपलब्धियों के लिए उन्हें पद्मश्री और अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया। उन्होंने अपने सक्रिय करियर के बाद भी इसमें योगदान देना जारी रखा। उन्होंने महिलाओं को भी यह खेल अपनाने के लिए प्रेरित किया और दिल्ली में अखाड़ा बनाया ताकि महिलाएं इस खेल को अपना सकें। मास्टर चंदगीराम के निधन से सिर्फ कुश्ती जगत ही नहीं बल्कि भारतीय खेलों को बड़ी क्षति हुई है।

Monday, June 28, 2010

राहुल गांधी का मोबाईल चोरी

राहुल गांधी का मोबाईल चोरी


नई दिल्ली। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव राहुल गांधी का मोबाइल फोन गुम हो गया। पिछले सप्ताह लंदन से लौटने के बाद इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय एयर पोर्ट पर पहुंचे राहुल का मोबाइल सामान चैकिंग के दौरान चुरा लिया गया। हालांकि बाद में यह मोबाइल दिल्ली एयरपोर्ट पर काम करने वाले बैगेज हेंडलर के पास से बरामद कर लिया गया ।

सूत्रों के अनुसार एयरपोर्ट से घर आते हुए राहुल को फोन खो जाने का पता चला। इसके बाद उन्होंने विशेष सुरक्षा समूह के अधिकारियों को इस बाबत सूचित किया। घटना की जानकारी मिलते ही तुरंत प्रभाव से एसपीजी ने सीआईएसएफ से संपर्क किया गया। सीआईएसएफ ने इस पर कार्रवाई करते हुए मामले की जांच शुरू की और सीसीटीवी केमरो की फुटेज को देखा। तकनीकी निगरानी विभाग ने गांधी के मोबाईल फोन को तलाशने में सीआईएसएफ की मदद की।
जांच के दौरान दो बेगेज हेडलरों पर शक होने के बाद उनसे पूछताछ की गई। पूछताछ के दौरान उनमें से एक ने राहुल के बैग से फोन चुराने की बात स्वीकार कर ली और फोन को सुरक्षा अधिकारियों को सौंप दिया। अधिकारियों के मुताबिक मामले के तूल पकड़ने के डर से इस संबंध में कोई मामला दर्ज नहीं किया गया। बताया जा रहा है कि गांधी के मोबाईल में निजी और व्यायवसायिक नंबर होने के साथ ही कुछ सूचनाएं भी थी। हालांकि अधिकारियों ने इस बारे में जानकारी देने से इन्कार कर दिया।

भाजपा को पुराने धुरंधरों का सहारा : नीरज कुमार दुबे

भाजपा को पुराने धुरंधरों का सहारा
नीरज कुमार दुबे

जसवंत सिंह की ९ महीने बाद भाजपा में ससम्मान वापसी तो हो गई लेकिन इससे यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या अब भाजपा जिन्ना मुíे पर जसवंत के रुख से इत्तेफाक रखती है? जसवंत जिस तरह जिन्ना मुíे पर अपने रुख पर अभी भी कायम हैं और भाजपा इस मुíे पर जिस तरह चुप है, उससे यही स्पष्ट होता है कि जिन्ना तो एक बहाना था, दरअसल भाजपा को लोकसभा चुनावों में हार के बाद मीडिया में लगातार हो रही अपनी किरकिरी से बचने के लिए किसी को बलि का बकरा बनाना था।
जसवंत इसलिए भी निशाने पर थे क्योंकि उन्होंने उन ‘खास’ लोगों पर लगाम कसने की मांग की थी जिनके हाथों में पूरे चुनाव का प्रबंधन था, जाहिर है उस शक्तिशाली वर्ग को जिन्ना के बहाने जसवंत पर निशाना साधने का मौका मिल गया। जसवंत ने जब चुनावों में हार के बाद पार्टी को आत्मविश्लेषण करने की सार्वजनिक रूप से सलाह दी थी तो यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी जैसे नेताओं के भी हौसले बुलंद हुए और उन्होंने भी मीडिया के माध्यम से पार्टी को कोसा और सलाह प्रदान की तब यह महसूस किया गया था कि जसवंत अनुशासनहीनता कर रहे हैं लेकिन उनकी वरिष्ठता को देखते हुए इस बात को नजरअंदाज कर दिया गया था लेकिन जिन्ना पर आधारित पुस्तक ने उनके खिलाफ कार्रवाई का मार्ग प्रशस्त कर दिया और गत वर्ष शिमला में आयोजित पार्टी की चिंतन बैठक में एकाएक जसवंत सिंह को पार्टी से निकाल दिया गया।
जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष बताना संघ को कतई मंजूर नहीं है और इस मुíे पर वह किसी को नहीं बख्शता। उसने तो पाकिस्तान में लालकृष्ण आडवाणी ने जब बयान दिया कि जिन्ना धर्मनिरपेक्ष थे, तब उनसे भाजपा अध्यक्ष की कुर्सी छीन ली थी। जसवंत ने जब जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष बताते हुए पुस्तक लिखी तो भाजपा के शक्तिशाली गुट को संघ से यह कहने का मौका मिल गया कि उन्होंने विचारधारा के खिलाफ कदम बढ़ाया है। ऐसे में नागपुर से हरी झंडी मिलते ही जसवंत की पार्टी से रवानगी हो गई।
लेकिन जिस प्रकार ९ महीने के अंदर ही जसवंत सिंह को पार्टी में वापस ले लिया गया उससे साफ जाहिर है कि पार्टी ने तब जो गलती की थी उसे अब सुधार लिया है। बताया जा रहा है और खुद जसवंत सिंह ने भी कहा है कि पार्टी में उनकी वापसी के प्रयास आडवाणी ने शुरू किये। यह वही आडवाणी हैं जोकि उस बैठक में मौजूद थे जिसमें जसवंत को पार्टी से निकालने का निर्णय हुआ था। जसवंत ने आडवाणी के साथ लगभग चालीस वर्षों तक काम किया ऐसे में आडवाणी को जसवंत को पार्टी से निकालने का विरोध करना चाहिए था लेकिन खुद जिन्ना मुíे पर कार्रवाई का सामना कर चुके आडवाणी शायद उस समय इस मुíे पर दोबारा संघ से उलझना नहीं चाहते थे इसलिए उन्होंने कुछ समय इंतजार करना उचित समझा।
जसवंत की पार्टी में वापसी की राह इस बात से भी आसान हो गई कि शुरुआती ना नुकुर के बाद उन्होंने पार्टी के कहने पर संसद की लोक लेखा समिति का अध्यक्ष पद छोड़ दिया था इसके अलावा पार्टी से निकाले जाने के बाद उन्होंने बेहद संयमित रवैया अपनाया था और आडवाणी के खिलाफ एकाध बयान देने के अलावा उन्होंने पार्टी के किसी नेता के खिलाफ बयान नहीं दिया था। जसवंत की पार्टी में वापसी होगी इसका पहला संकेत नितिन गडकरी के भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद तब मिला था जब उन्होंने कहा था कि वह पार्टी छोड़कर गए नेताओं की वापसी के लिए पहल करेंगे। इसके बाद गडकरी ने जसवंत के बेटे मानवेन्द्र सिंह को पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का सदस्य बनाया, बाद में जसवंत ने भी बयान दिया कि भाजपा उनके खून में है और वह उसे अलग नहीं कर सकते। इसके बाद पूर्व उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत के अंतिम संस्कार में जयपुर जाते समय आडवाणी खुद अपने साथ विमान में जसवंत सिंह को ले गये तब इस बात की लगभग पुष्टि ही हो गई कि जसवंत देर सवेर पार्टी में शामिल हो जाएंगे। आखिरकार यह हुआ भी। अब इस बात के कयास लगाये जा रहे हैं कि उमा भारती और कल्याण सिंह की भी पार्टी में वापसी होगी। उमा भारती के बारे में तो बताया जा रहा है कि कोई फार्मूला तय किया जा रहा है कि जिससे साध्वी अपनी पुरानी भगवा पार्टी में शामिल होकर उसे मजबूत बनाएं।
दूसरी ओर, भाजपा भले ही अब यह दावे कर रही हो कि कमान पूरी तरह दूसरी पीढ़ी के हाथों में आ गई है, लेकिन हकीकत में ऐसा दिखता नहीं है। अब भी सभी निर्णयों पर आडवाणी हावी दिखते हैं। संघ की विचारधारा से हट कर पुस्तक लिखने वाले जसवंत की पार्टी में वापसी कराना हो या फिर हाल में संपन्न राज्यसभा चुनावों में उम्मीदवारों का चयन, सब जगह आडवाणी की खूब चली। ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि कहीं दूसरी पीढ़ी मात्र रबर स्टाम्प का कार्य तो नहीं कर रही।
बहरहाल, अब देखना यह है कि पुराने धुरंधरों के सहारे भाजपा कितना आगे बढ़ पाती है। उसके सामने चुनौती है कि वह कुछ नए धुरंधर भी तैयार करे। पुरानों पर ही बार-बार दांव लगाना सही नहीं होगा। पार्टी की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि कांग्रेस का सशक्त विकल्प होने के बावजूद लोग उस पर और उसके नेताओं पर विश्वास नहीं कर पा रहे हैं। लोगों के बीच अपने प्रति भरोसा कायम करना पार्टी की प्राथमिकता होनी चाहिए।

Saturday, June 26, 2010

माधुरी गुप्ता की न्यायिक हिरासत अवधि बढ़ाई
नई दिल्ली। एक स्थानीय अदालत ने पाकिस्तानी खुफिया अधिकारियों को गोपनीय सूचना उपलब्ध करने के आरोप में गिरफ्तार राजनयिक माधुरी गुप्ता की न्यायिक हिरासत शनिवार को 14 दिन के लिए बढ़ा दी।
मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट कावेरी बावेजा की अदालत ने गुप्ता को फिर नौ जुलाई तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया। उसे आज अदालत में पेश किया गया था। इससे पहले 31 मई को उसकी न्यायिक हिरासत बढ़ाई गई थी। दिल्ली पुलिस ने गुप्ता को इस्लामाबाद से आने के बाद 22 अप्रैल को गिरफ्तार कर लिया था। उसे इस्लामाबाद से बुलाया गया था। वह वहां प्रेस एवं सूचना शाखा में द्वितीय सचिव थी।
पुलिस ने अबतक गुप्ता के मामले में आरोपत्र दायर नहीं किया है जिसे गिरफ्तारी के 90 दिनों के अंदर दायर करना होता है।

Wednesday, May 12, 2010

सैंट सी.आर. मॉडल सीनियर सैकेंडरी स्कूल का बोर्ड कक्षा आठवीं का परीक्षा परिणाम शत-प्रतिशत

पलवल, 12 मई। पलवल के अलीगढ़ रोड स्थित सैंट सी.आर. मॉडल सीनियर सैकेंडरी स्कूल का बोर्ड कक्षा आठवीं का परीक्षा परिणाम शत-प्रतिशत व शानदार रहा। स्कूल की छात्रा राखी सिंगला ने 94 प्रतिशत अंक प्राप्त कर प्रथम, पूजा डागर 92 अंक प्राप्त कर द्वितीय व डॉली शर्मा ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। अंग्रेजी माध्यम के सभी विद्यार्थियों ने 75 प्रतिशत से अधिक अंक अर्जित कर परीक्षा पास की। प्रथम स्थान प्राप्त करने वाली छात्रा राखी सिंगला का आईआईटी से इंजीनियरिंग करने का सपना है। स्कूल के छात्रों ने 80 प्रतिशत से अधिक अंक अर्जित किए। स्कूल के विद्यार्थियों पल्लवी तालान, वर्षा शर्मा, वंदना रानी, अलका रानी, प्रीति माल्या, कैलाशी माहोल, अनिल कुमार, शिव कुमार, कृष्ण गहलोत, वीनिता रानी, मोहित शर्मा, पूनम दलाल, बहादुर चौहान, ऋतु दलाल, रेखा रावत, सोनम चौधरी, अजीत अत्री व मोनिका डागर ने मैरिट सूची में नाम दर्ज कराया है। पूजा डागर व राखी सिंगला ने गणित विषय में 100 में से 100 अंक, राखी सिंगला ने संस्कृत विषय में 100 में से 100 अंक तथा प्रियंका डागर ने अंग्रेजी विषय में 100 में से 100 अंक प्राप्त किए। स्कूल प्रबंधक सतबीर पटेल ने विद्यार्थियों, अभिभावकों व शिक्षकों को बेहतर परीक्षा परिणाम की बधाई दी। स्कूल ने इस वर्ष आईआईटी, एआईईईई व डिफेंस आदि क्षेत्रों में बच्चों का चयन कराकर कीर्तिमान स्थापित किए हैं।

Friday, April 30, 2010

अमर साहनी कृत ‘अथ पुरुष व्यथा’ की व्यथा

अमर साहनी कृत ‘अथ पुरुष व्यथा’ की व्यथा

Ramesh Parsoon
4/75, Civil Lines, Behind Telephone Centre, Bulandsahar-203001 (U.P.)

‘अथ पुरुष व्यथा’ अर्थात पुरुष वर्ग की व्यथा का निरुपण एवं नारियों द्वारा किए गए व किए जा रहे पुरुष-उत्पीड़न के पक्ष का प्रस्तुतिकरण। यह है प्रख्यात कवि एवं लेखक अमर साहनी द्वारा १७ उपशीर्षकों में अभिव्यक्त एवं लिखित पुस्तक ‘अथ पुरुष व्यथा’ का मूल कथ्य। पुरुष भी अचम्भित है कि उसकी सुप्त अस्र्तव्यथा एवं नारियों द्वारा किए जा रहे उत्पीड़न की अभिव्यक्ति जिसे आज तक बड़े से बड़ा साहित्यकार भी इतना खुलकर सामने लाने का साहस नहीं कर पाये, अमर साहनी ने इतनी सहजता से कैसे कर दी। दूसरी ओर नारीवादी साहित्यकारों एवं मुक्ति के मोर्चे तक लाने के लिए नारी वर्ग को उकसाने वाली कथित प्रगतिशील लेखिकाओं में तिलमिलाहट इसलिए भी है कि साहनी ने नारीवादियों के नारों को मात्र ‘शगूफा’ सिद्ध कर दिया है। उन नारों का खोखलापन उजागर कर दिया है, उनके साहित्यिक पाखंड एवं सांस्कृतिक ढांेग को सबके सामने रख दिया है, उसके औचित्य पर प्रश्नचिन्ह बेबाक तरीके से लगा दिया है। एक संवेदनशील लेखक इससे उद्वेलित क्यों हो उठा? उसे पुरुष-व्यथा लिखने की आवश्यकता क्यों आ पड़ी? इन सब कारणों का सार उनके संपूर्ण तार्किक कथन में स्वत: उल्लेखित है। उन्होंने अपने ‘उपसंहार’ में स्पष्ट किया है कि वे नारी अस्मिता के कदाचित विरोधी नहीं हैं। नारी शक्ति की उपादेयता, उसके औचित्य, उसकी आवश्यकता, उसकी सहभागिता को चुनौती देने का अथवा सारा दोष नारी जाति पर मढ़कर उसे आरोपित करने का, अपमानित करने का उनका इरादा कदाचित नहीं है। लेकिन ऐसी स्थिति में वे सत्य को असत्य से एवं तथ्य को अतथ्य से ढककर या मुंह फेरकर नहीं बैठ सकते। उनके कहने का तात्पर्य यह है कि समाज में क्या नारी द्वारा पुरुष का उत्पीड़न नहीं होता या फिर मात्र पुरुष द्वारा ही सदैव नारी का उत्पीड़न किया जाता है, इसी विचार से उद्वेलित होकर जो तथ्य उन्होंने इस सभ्य समाज के विभिन्न वर्ग की नारियों के, ऐतिहासिक पात्रों के, मिथकीय नारी चरित्रों के उदाहरण दे-देकर प्रकट किए हैं, वे एकदम समीचीन हैं, विचारणीय हैं, चिंतनीय हैं। उपेक्षणीय तो कदाचित नहीं। वैसे भी वर्तमान दौर में हम खुली आंखों से स्पष्टत: देख रहे हैं कि नारी-विमर्श के परिप्रेक्ष्य में नारी उत्थान, नारी सुधार, नारी जागरण, नारी चेतना, नारी विकास, नारी स्वातंत्रय या नारी मुक्ति के नाम पर जितने भी आंदोलन सड़क पर या समाज में, राज्यों में या राजनीति में अथवा साहित्य में या संस्कृति में किए गए हैं अथवा किए जा रहे हैं, वे सभी मूलत: पुरुष-पक्ष की उपेक्षा करते हुए, अवमानना करते हुए व प्रताड़ना देते हुए ‘नारी-नारी’ का नाम लेने मात्र, नारी-उत्पीड़न का नकारात्मक पक्ष प्रदर्शित करते हुए विकसित किए गए हैं तथा विकसित किए जा रहे हैं। इन सभी का दृष्टिकोण सर्वथा एकांगी है, एक पक्षीय है। एकांगी व एक पक्षीय इसलिए कि ऐसे सभी कार्यों में वैचारिक पूर्वाग्रह एवं दुराग्रह पहले से ही इस प्रकार निर्धारित कर लिए गए हैं अथवा किए जा रहे हैं कि समाज में नारी का शारीरिक, मानसिक व आर्थिक उत्पीड़न लगातार किया जा रहा है, इसके लिए मात्र पुरुष एवं पुरुष मानसिकता ही उत्तरदायी है क्योंकि इस समाज का परिवेश पूर्णत: पुरुष प्रधान है जिसके कारण नारी को दबाया नहीं जा रहा है, पीछे धकेला जा रहा है, उसके साथ अन्याय किया जा रहा है, अत: पुरुष समाज का विरोध होना चाहिए, उसकी अवमानना होनी चाहिए, उसकी उपेक्षा होनी चाहिए, उसका अपमान होना चाहिए, जिस स्तर पर जितना भी संभव हो सके पुरुष आधिपत्य के विरुद्ध विद्रोह होना चाहिए, यह सब करने के लिए यदि शालीनता त्यागनी पड़े तो त्याग देनी चाहिए, मर्यादाएं तोड़नी पड़ें तो तोड़ देनी चाहिएं, आचरण की धज्जियां बिखेरनी पड़ें तो बिखेर देनी चाहिएं क्योंकि यह पुरुष-वर्ग अत्याचारी है, बलात्कारी है, अहंकारी है, हिंसक है, बलवान है, समर्थ है, शारीरिक रूप से अधिक सक्षम है, आर्थिक रूप से अधिक सुदृढ़ है, मानसिक रूप से अधिक संपन्न है, सारे अवसर इसी के हाथ में हैं, पुरुष ही इस व्यवस्था का संचालक बना हुआ है, व्यवस्थापक बना हुआ है। अत: इसी कारण नारी शोषित है, विवश है, विपन्न है, असहाय है, सहनशीला है। अब उसे पुरुष व्यवस्था से मुक्ति चाहिए, स्वतंत्रता चािहए, इसी से प्रगतिशीलता स्थापित होगी, नारी-चेतना बलवती होगी, नारी-विमर्श सार्थक होगा, पुरुष के चंगुल से नारी को मुक्ति मिलेगी। इस प्रकार की अवधारणाएं स्थापित कर ली गई हैं, शब्द गढ़ लिए गए हैं चाहे वे समाज व नारी को दिखाई देने में उन्नति की ओर ले जाते हुए लगे जबकि हैं वास्तविक रूप में पतन की ओर ले जाने वाले। इस पर क्या अंतर पड़ता है। इनका महिमा-मंडन तो ‘प्रगतिशील’ की छाप से ही हो रहा है। जो इनकी अवधारणाओं के विरुद्ध तर्क करने की हिमाकत करेगा, उसे रूढ़िवादी, परंपरावादी व सामंतवादी के ठप्पे से ठाप दिया जाएगा। इन अवधारणाओं के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक प्रवक्ताओं की भीड़ भरे नामों से कुछ नाम जो उभरकर सामने आ रहे हैं, वे हैं - सुचेता कृपलानी, नंदनी सत्पती, मोहिनी गिरि, वृंदा कारत, महादेवी वर्मा, शिवानी, कृष्णा सोवती, चित्रा मुदगल, प्रभा खेतान, मन्नू भंडारी, मैत्रेयी पुष्पा, कमल कपूर, वैजयंती माला, हेमामालिनी, जयाप्रदा, शबाना आजमी, जयललिता, प्रतिभा, दीपा मेहता, नीना गुप्ता, मल्लिका सहरावत, अज्ञेय, राजेंद्र अवस्थी, मोहन राकेश, राजेंद्र यादव, बिपाशा बसु, जॉन इब्राहिम, आमिर खान, निर्मल वर्मा, मुकेश भट्ट, खुशवंत सिंह, तीस्ता सीतलवाड़, करीना कपूर व श्रीदेवी आदि की लंबी श्रृंखला है। यदि इनके मूल आचरण पर दृष्टि डाली जाए अथवा अपने आसपास ऐसे प्रगतिशील समाजसेवकों एवं साहित्यकारों को दृष्टिगत किया जाए तो नारीवादिता के अलम्बरदारों में अधिकतर वे स्त्रियां ही बढ़-चढ़कर भाग लेती हुई दिखाई देंगी जो जानबूझकर या परिस्थितिवश अभी तक ‘कुंआरी’ हैं या विवाह के पश्चात पुरुष का परित्याग कर आई हैं या पति ने उनका त्याग कर दिया है, या जो पर-पुरुष या अनेक पुरुषों से संबद्ध हैं अथवा पहले पति को छोड़कर दूसरे पति के साथ रह रही हैं अथवा ऐसे पुरुष की पत्नी हैं जिसने उनके कारण अपनी पहली पत्नी व बच्चों तक को छोड़ दिया है या कुछ बिना विवाह के ही पुरुष के साथ पत्नी की रह रही हैं। इसी प्रकार ‘प्रगतिशील’ नाम से महिमा-मंडित पुरुषों को अपने आसपास ही ध्यान से देखिये तो मिलेगा कि उनमें से अधिकांश प्रगतिशीलता के नाम पर अपनी पत्नी की सहमति अथवा असहमति से अनेक कन्याओं का, औरतों का खुलकर या छिपकर उपयोग-उपभोग कर रहे हैं। कुंआरे हैं या विधुर हैं। पत्नी है तो पत्नी से अलग हैं या पत्नी छोड़कर चली गइ है। दो या अधिक पत्नियां रखे हुए हैं या विरक्त हैं। ‘शराब-सिगरेट-नारी’ इनका शौक है, इनकी लत है, बौद्धिकता के पोषण के लिए वे इसे आवश्यक मानते हैं। नारीवादिता का शगूफा छोड़ते हंै, अखबारों में छपते हैं, समारोहों में विज्ञापित होते हैं। इन कथित प्रगतिशील नारीवादियों ने अंतत: नारी को क्या दिया? मुंबई में सड़कों पर नंगी होकर दौड़ लगाती नारी को मुक्तता दी, चौराहों पर चूड़ी तोड़कर, ‘ब्रा’ उतारकर उसे फूंकती उच्छृंखलता दी, बदतमीजी करने की छूट दी, व्यावसायिक दौड़ में अंधे बाजार दिए, ‘लिव-इन-रिलेशनशिप’ दी, समलैंगिकता दी, जुगोलो संस्कृति दी, मूल्यहीनता दी, जींस दी, टॉप दी, मात्र चड्ढी व उरोज दर्शना ‘ब्रा’ में नग्न-अर्धनग्न विज्ञापन-प्रदर्शन हेतु टेलीविजन पर दर्शन की उद्दंडता दी, लिपटने-चिपटने, चूमने-चाटने के दृश्यांकन दिए, कामतृप्ति की कृत्रिम-अकृत्रिम सुविधाएं दी, मां-बाप को बेलिहाज बेटियां दी, मेकअप की नई स्टाइल दी, घरों को तोड़ती बहुएं दीं, ससुरालवालों को कानूनी पेंचों में फंसाती हुई लड़कियां दीं, पुरुष ‘वेश्याओं’ का दोहन करती धनाढ्याएं दीं, पर-पुरुष, बॉस अथवा माननीयों का शोषण करती हुई युवतियां दीं। नहीं दिया तो उस ओर ध्यान नहीं दिया जिस ओर संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट एवं नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े चीख-चीखकर बता रहे हैं कि भारतवर्ष में प्रतिदिन २००० कन्या भ्रूणों की हत्या की जाती है, हर तीसरे मिनट में एक महिला का उत्पीड़न हो जाता है, प्रत्येक ७६वें मिनट में एक महिला दहेज दानवों द्वारा मार दी जाती है, प्रत्येक ९वें मिनट में एक महिला अपने पति अथवा संबंधियों द्वारा उत्पीड़ित की जाती है तथा प्रत्येक १५ से ४९ वर्ष की महिलाओं में से ७० प्रतिशत महिलाएं किसी-न-किसी प्रकार घरेलू एवं बाह्य हिंसा का शिकार हो जाती हैं। इस सब में भी सबसे प्रमुख तथ्य यह है कि इन कृत्यों के पीछे कृत्य करने वाली अथवा मिल-मिलाकर पुरुषों को ऐसा कृत्य करने के लिए उकसाने वाली महिला ही होती है। चाहे वह पुरुष या स्त्री की मां के रूप में हो या सास के रूप में हो, बहन के प में हो या ननद के रूप में हो, भाभी के रूप में हो या देवरानी-जेठानी के रूप में हो, बहू के रूप में हो या बेटी के रूप में हो, क्रिया की उत्प्रेरक महिला ही होती है, पुरुष को तो कर्ता बना दिया जाता है। किन्हीं-किन्हीं स्थितियों में तो महिला ही महिला के विरुद्ध होने वाले सीधे अत्याचार का सीधा-सीधा कर्ता-कारक-कारण होती है। आश्चर्य है! ऐसी घटनाओं में छिपे ऐसे तथ्यों पर अन्वेषण, चर्चा, उल्लेख, बहस, विश्लेषण, विवेचन ये तथाकथित नारीवादी, बुद्धिजीवी या कार्यकर्ता क्यों नहीं करते? इतना ही नहीं नारी स्वातंत्रय की अगुवा नारियां व संस्थाएं तक भी केवल उच्च वर्ग अथवा उच्च-मध्यम वर्ग अथवा अति उत्तेजना के साथ प्रकट हुई घटनाओं में ही हस्तक्षेप किया हुआ दिखलाती हैं। इनको गोबर बीनती हुई, सड़क कूटती हुई, घास काटती हुई, बोझ ढोती हुई, ग्रामीण व अशिक्षित परिवेश में घड़ी-घड़ी मायके व ससुराल वालों के ताने, उत्पीड़न, शोषण, दोहन, दुरुपयोग सहती हुई लाचार महिला दिखाई नहीं देती। उच्च वर्गों द्वारा ग्रामीण अंचल में दरिद्र एवं दलित महिलाओं के साथ किए गए अनाचार, बलात्कार दिखाई नहीं देते। ये संस्थाएं हिन्दू तथा मुस्लिम महिलाओं के दुख में अंतर और उस अंतर के अनुसार व्याख्याओं में अंतर करना तो भलीभांति जानती हैं लेकिन देश की ग्रामीण एवं पिछड़ी हुई अधिकांशत: उपेक्षित आबादी में महिलाओं के कितने विकास कार्यक्रम, कितने सुधार कार्यक्रम तथा कितने न्याय-संरक्षण कार्यक्रम कैस-कैसे चलाती हैं, क्या-क्या गतिविधियां चालू रखती हैं, इसका ब्यौरा कहीं नहीं देतीं। यह तो तथ्य रूपी सिक्के का एक पहलू रहा। दूसरा पहलू है पुरुष उत्पीड़न का। प्रश्न है कि क्या केवल महिलाओं का ही उत्पीड़न होता है समाज में? क्या पुरुष का उत्पीड़न नहीं होता? संयुक्त राष्ट्र संघ की कोई रिपोर्ट अथवा नेशनल क्राइम ब्यूरो की रिकार्ड रिपोर्ट अथवा जनवादियों-प्रगतिवादियों या नारी वादियों द्वारा कभी भी निष्पक्ष रूप में पुरुष-उत्पीड़न से संबंधित आंकड़े अथवा सर्वेक्षण क्यों प्रकाशित-प्रसारित नहीं किए जाते? यह कभी रिकार्ड पर आता ही नहीं कि वास्तविक रूप में कितने प्रतिशत पुरुष नारियों द्वारा उत्पीड़ित हैं? किस-किस प्रकार से अपने आसपास से ही यदि एकत्रित करके देखा जाए तो पाया जाएगा कि ९० प्रतिशत से अधिक शिक्षित अथवा अशिक्षित पुरुष नारियों से जिसमें उसकी मां, बहन, पत्नी, पुत्री, प्रेमिका, रखैल-मित्र सम्मिलित हैं, किसी न किसी रूप में, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में, प्रकट अथवा अप्रकट रूप में, शारीरिक उपीड़न के, मानसिक उत्पीड़न के अथवा आर्थिक उत्पीड़न के बुरी तरह शिकार हैं। कहा जाता है कि नारी अत्यधिक सहनशील है लेकिन देखा जाए या सर्वे किया जाए तो निश्चित रूप से पाया जाएगा कि पुरुष वर्ग का अधिकतम भाग अउल्लेखित पीड़ा के साथ नारी के भिन्न-भिन्न रूपों द्वारा भिन्न-भिन्न प्रकार से किए जा रहे मानसिक, आत्मिक व आर्थिक उत्पीड़न की विकट स्थिति में जी रहा है। उसकी विवशता तो देखिये कि उसने किसी न किसी स्तर पर मानसिक पीड़ा की शाब्दिक चुप्पी के साथ कैसे-कैसे और कितनी सहनशीलता स्वीकार कर ली है। सूटेड-बूटेड, अच्छे-अच्छे विचारक, विज्ञ-विद्धान, उच्च पदेन आरुढ़, सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त अथवा सक्रिय आंदोलनों में रत पुरुषों की विवेचना करके देख लीजिए, विश्लेषण करके देख लीजिए, महिलाओं द्वारा किसी न किसी रूप में अति सूक्ष्म एवं छद्म तरीके से किए गए उत्पीड़न का शिकार मिलेंगे। कभी-कभी नारियों द्वारा पुरुष का इस प्रकार किया गया अव्यक्त उत्पीड़न ही रह जाता है। ऐसे ही सारे तथ्य, ऐसी ही सारी बातें, ऐसी ही सारी व्यथाएं आलोखित हैं, अमर साहनी कृत ‘अथ पुरुष व्यथा’ में। बस इसी बात पर वास्तविकता को व्यक्त करने वाले ७४ वर्षीय वरिष्ठ साहित्यकार पर कथित प्रगतिशील विचारकों तथा नारीवादियों की भृकुटियां तन जाएंगी। उनकी सोच को बुजुर्आ सोच, उनके विचारों को परंपरावादी विचार, उनकी भावनाओं को सामंतवादी वृत्ति की अपगाहना करने वाली बताया जाएगा। यह कैसी प्रगतिशीलता है, यह कैसी नारीवादिता है? यह तो कुछ ऐसी ही बात हुई कि जैसे किसी शहर में हिन्दू-मुस्लिम दंगा हो जाए तो समस्त मीडिया, पत्रकार, बुद्धिजीवी उसे सांप्रदायिक दंगा नामित करना पसंद करेंगे। हिन्दू-मुस्लिम दंगा नहीं। हिन्दू मारा जाएगा तो हिन्दुओं का पक्ष रखने वालों को सांप्रदायिक बताया जाएगा और यदि मुस्लिम मारा जाएगा तो मुस्लिम के पक्ष में बोलने वाले को धर्मनिरपेक्ष, प्रगतिशील, समाजवादी घोषित किया जाएगा। इसी प्रकार, नारी चाहे गलत है अथवा सही, नारीवादियों की दृष्टि में उसे गलत बताने वाला बुजुर्आ है, उसे सही बताने वाला, उसके पक्ष में हंगामे का नाटक करने वाला प्रगतिशील है, नारीवादी है, आधुनिक विचारधारा का पोषक है? ऐसा ही कुछ अमर साहनी की इस कृति के साथ व्यवहृत होना निश्चित है। यद्यपि स्वयं साहनी किसी भी प्रकार गलत रूढ़ियों और सड़ी-गली मान्यताओं को ढोने वाला नहीं है किन्तु वह निश्चित रूप से गलत अवधारणाओं के ढांेगी प्रदर्शन एवं बनावटी नारीवादिता का ढिंढोरा पीटे बिना उनके सुमार्ग की, उनकी उन्नति की, उनको मिलने योग्य वांछित न्याय एवं लाभ की कामना करने वालों में हैं। सच तो यह है कि पुरुष उत्पीड़न, पुरुष-पीड़ा, पुरुष-वेदना जैसे संवेदनशील विषय साहित्य व समाज के प्रचलन में प्राय: उपेक्षित ही हैं, उनको खुलकर सम्मुख लाने का जो साहस दिखाया है, साहनी ने वह निश्चित रूप से ऐतिहासिक महत्व का है। यह महत्वपूर्ण कार्य साहित्य में चिंतन-मनन करने वाले बौद्धिक वर्ग को पुरुष-पीड़ा के संदर्भ में उत्पीड़न के वास्तविक एवं संभावित विश्लेषण प्रस्तुत करने में सहायक सिद्ध होगा। पीड़ा तो पीड़ा है। पुरुष की ही अथवा स्त्री की। क्या पुरुष की पीड़ा, पीड़ा नहीं है। इस पुरुष-पीड़ा के पक्ष को ‘अथ पुरुष व्यथा’ में कुशलता से स्थापित करने का सफलतम सुप्रयास किया है साहनी ने। उन्होंने ‘प्रस्तावना’ में स्पष्ट कहा है कि ‘बुद्धिजीवी वर्ग का यह अनिवार्य कर्तव्य बनता है कि बिना सस्ती शोहरत की, लालच के ईमानदारी से समाज में नारी और पुरुष की सही स्थिति सामने लाएं।’ जयभगवान गुप्त ‘राकेश’ ने ‘अथ पुरुष व्यथा’ के पक्ष में सही व सटीक आख्या प्रस्तुत की है कि ‘स्त्रीवादी लेखक-लेखिकाओं द्वारा मोर्चाबंदी के तहत पुरुषों के विरुद्ध ज्यादा उकसाया जाने लगा तो इसके बाद इन्हें पुरुष तो बेचारा और पिछड़ा हुआ एक ऐसा निरीह आरोपी लगा जिसके पास कहने को तो बहुत कुछ है मगर उसकी सुनने वाला कोई नजर नहीं आता।’ साहनी ने बड़े सलीके से सिलसिलेबार पुरुष की उपेक्षा, अवहेलना, अवमानना व प्रताड़ना के संदर्भ में मार्मिक अभिव्यंजना तथा अक्षम स्त्री के मुकाबले सक्षम होते हुए भी पुरुष की असहाय अवस्था भावनात्मक रूप में व्यांजित की है। घर पर नारी के वर्चस्व की उनकी आख्या व टिप्पणियों से असहमत होने का तो कोई कारण बनता ही नहीं है। पत्नी की इच्छा, मान-मनुहार, आपत्तियों को ‘हमारा समाज पुरुष प्रधान-कितना सच’ में तथा ‘अपनी मर्जी का मालिक नहीं’ में ‘सुदामा-श्रीकृष्ण-रूक्मणी’ के उदाहरण के साथ व्यावहारिक प्रस्तुति प्रस्तुत की है। ‘मान-अपमान : नारी के रहमो करम पर’ यह पुरुष-पीड़ा के कथन का पांचवां चरण है। क्या हम समाज और परिवार में प्रतिदिन नहीं देखते कि नारी चाहे तो असामान्य स्थितियों में भी पुरुष के सम्मान की रक्षा अक्षुण रख सकती है और यदि चाहे तो पुरुष के स्थापित सम्मान को देखते-देखते क्षणभर में मटियामेट कर सकती है। इस कथन की पुष्टि के लिए एक ओर भगवान विष्णु-लक्ष्मी जी एवं बुढ़िया की लोकोक्ति का सहारा लिया गया है तो दूसरी ओर सत्य घटना का। सहारा किसी भी कथ्य का लिया हो लेकिन शीर्षक के कथन को झुठलाया नहीं जा सकता। एक ओर नारी का मान-सम्मान बनाए रखने के लिए पुरुष द्वारा किए गए समझौतों की व्यथा है तो उससे अगले सोपान पर सिकंदर-उसके गुरु अरस्तू एवं वेश्या के कथ्य द्वारा नारी के इशारों पर पुरुष के नाचने की विवशता का सजीव चित्रण है। नारी की इस शाश्वत सोच का कि ‘नारी को पुरुष की परेशानियों से कोई मतलब नहीं, उसकी मांगों को पूरा करना पुरुष का दायित्व है’ कैकेयी, लैला, रक्तबीज एवं मच्छर के कथोप कथनों द्वारा अनुपम दृश्य उपस्थित किया है। इसके अतिरिक्त ‘घरेलू हिंसा’, ‘यौन शोषण’, ‘नारी का मजबूत शिकंजा’, ‘त्रिया हट’, ‘देह व्यापार’, ‘स्वार्थ साधिका’, ‘दूसरी औरत’, ‘सैडिस्ट (विकृत) स्वभाव’ जैसे स्वव्याख्यायित एवं तीव्रता से अभिव्यंजना प्रस्तुत करने वाले उपशीर्षकों के कथन एवं पुष्टि हेतु प्रस्तुत उदाहरणों से नारी के विभिन्न रूपों को, विविध स्वरूपों को, त्रिया चरित्र की कुटिलता को एवं स्त्री जाति की छलपूर्ण कपटता की नग्नता को तर्कसंगत ढंग से उद्घाटित कर दिया है जिसके कारण पुरुष की असहजता, असहायपन, असहनीय को भी सहन करने से उत्पन्न छटपटाहट, विष बुझे तीरों से आहत अव्यक्त वेदना, असामान्य स्थितियों में स्वयं को सामान्य बनाये रखने की विवशता एवं पग-पग पर पुरुष-व्यथा की वास्तविकता की परतों के नीचे दबी परतों को भावनात्मक धरातल पर उकेर कर विचारोत्तेजना की परिणति तक पहुंचाने में साहनी द्वारा लेखकीय क्षमता का चिंतनपूर्ण अन्यतम उदाहरण प्रस्तुत किया गया है। लेखक अपने मिशन में, अपने उíेश्य में पूर्णत सफल सिद्ध हुआ है। उसके मन्तव्य की सकाररात्मकता समस्त संभावित नकारात्मकता को नकार कर पुरुष-पीड़ा की पीड़ित अनुभूतियों का संवेदनात्मक स्पर्श कराते हुए आगे बढ़ गई है। लेखक ने तथाकथित नारीवादियों की तरह दोहरा मापदंड अपनाते हुए न तो किसी स्थल पर नारी की प्रकृति-प्रदत्त प्रवृत्ति में छुपी हुई क्रूरता-उच्छृंखलता एवं उíंडता को छुपाने का या परिवर्तित करने का प्रयास किया है और न ही नारी की वास्तविक वेदना को आहत करने के मूल्य पर पुरुष वेदना को बलात् अभिव्यक्ति देने का प्रयास किया है। यह इस रचना की सबसे बड़ी विशेषता है कि लेखक ने जो कुछ कहा है, पूर्णत: ईमानदारी के साथ कहा है, उसमें जरा सी भी कृत्रितमा या अतिश्योक्ति नहीं है। जो कुछ वास्तविक है या जो कुछ जैसे घटित हो रहा है वैसे ही वर्णित किया हैं उसका तात्पर्य, उसका मन्तव्य, उसकी दशा, उसकी दिशा एकदम स्पष्ट है। कोई पूर्वाग्रह नहीं। कोई दुराग्रह नहीं। न तो उसने किसी की प्रगतिशीलता पर चोट पहुंचाई है और न ही वह स्वयं किसी भी स्तर पर अप्रगतिशील है। पुरुष-वेदना को उजागर करना उसका लक्ष्य था, वह उसने चुनौतियों की परवाह किए बिना अर्जित किया ही क्योंकि मानने वाले चाहे मानते रहे, ऐसा तो कदापि स्थापित नहीं हो सकता कि नारी-वेदना का बखान करना तो प्रगतिशीलता है और पुरुष-वेदना का बखान करना प्रगतिशीलता नहीं है। साहनी की यह साहित्यिक कृति उनके १७ शीर्षकबद्ध उप निबंधों के सम्मिलन से सृजित एक वृहद एवं विस्तृत निबंध के रूप में है जिसकी भाषा सहज, सरल, उर्दू-पंजाबी मिश्रित हिन्दी की बोलचाल की भाषा है तथा शैली आख्यात्मक एवं विवेचनात्मक है। विविध एवं विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से रोचकता जीवंत रखी गई है जो स्वत: सुग्राह्य है, सुपाठ्य है, सारगर्भित है एवं तार्किक है। विश्लेषणात्मक गवेषणा की दुरुहता से बचा गया है। कृति प्रयोगात्मक है लेकिन प्रयुक्त मिथकीय उदाहरणों में सावधानी बरती जानी चाहिए थी क्योंकि पौराणिक प्रसंगों का इतिहास पौराणिक ही होता है जो स्वयं में पूर्णत: स्पष्ट नहीं है। एक प्रसंग एक पुराण में एक तरीके से कहा गया है तो दूसरे पुराण में वही प्रसंग दूसरे तरीके से। Upaर से इन प्रसंगों पर भिन्न-भिन्न लोकोक्तियां गढ़ ली गई हैं जो सदैव विवाद का विषय बनी रहती हैं। इन प्रसंगों का उपयोग संभलकर ही किया जाता तो अधिक प्रभावशाली रहता। प्रकाशक को यह पता अवश्य होना चाहिए था कि ‘पुरुष को ‘पुरूष’ नहीं लिखा जाता। इस निबंधात्मक कथ्य के कथन में सान्निहित तथ्यों से स्वयं स्पष्ट है कि विषयगत कथ्य के उद्घाटन का अर्थ यह कदाचित नहीं लगाया जा सकता कि लेखक अंतत: नारी विरोधी है, नारी का विकास नहीं चाहता, नारी की प्रगति उसे स्वीकार्य नहीं, नारी के उत्थान से असहमत है, नारी को समाज का अनिवार्य अंग नहीं मानता, नारी को घर-परिवार की आवश्यकता नहीं समझता, नारी को दायित्वों के निर्वहन के लिए समर्थ, सक्षम व योग्य नहीं मानता, पुरुष वर्ग के अन्याय के विरुद्ध नारी के संघर्ष के औचित्य को महत्व नहीं देना चाहता, यथास्थितिवादी है, रूढ़ियों में जकड़ा है, संकीर्ण विचारों का प्रवर्तक है या नारी-कुंठा से कुंठित है। इन सभी बातों पर खुला खुलासा लेखक अपनी प्रस्तावना एवं कथन के उपसंहार में पर्याप्त रूप से कर चुका है। उसके उल्लेखित उल्लेखों से इतना ही ध्वनित होता है कि उसे नारी के उस रूप-स्वरूप पर आपत्ति है जो पूर्णत: उíंड है, उच्छृंखल है, स्वतंत्रता के नाम पर अमर्यादित है, संस्कारनष्टा है, आचरण में अव्यावहारिक है, मानसिक विकृति से ग्रस्त है, कुप्रवृति का पोषक है, पथभ्रष्टा है, कुमार्गी है, जिसके कारण समाज प्रभावित हो रहा है, परिवार बिखर रहा है, पुरुष स्वयं को प्रताड़ित एवं उत्पीड़ित अनुभूत कर रहा है। लेखक की मान्यता है कि नारी चाहे तो कुमार्गी व्यवस्था को सुमार्ग पर ला सकती है, परिवार को सुगठित रख सकती है, सुदिशा प्रदान कर सकती है। अपने सुकृत्यों एवं पुरुष के साथ सहकार एवं प्यार से गली-सड़ी रूढ़ियों को तोड़कर, आबद्ध बेड़ियों को खोलकर ऐसी मान्यताएं स्थापित कर सकती है जिससे दुष्प्रवृतियों का अंत एवं परिवार व समाज का सतत गतिशील विकास संभव हो सके। इन सभी वांछित-अवांछित प्रक्रियाओं के अंतर्गत पुरुष व्यथा की उत्सर्जना को उद्घाटित करना मात्र ही लेखक का ध्येय है जिसे पूरा करने का उसने साहसिक प्रयास किया है, जो स्वयं चुनौतीपूर्ण परंपरा का प्रारंभ है। यह निश्चय ही स्वागत योग्य है। इस विषय पर शोधार्थियों के लिए शोध के नए आयाम प्रतिपादित करने में यह अवश्य ही सहायक होगा। निश्चित रूप से अमर साहनी बधाई के पात्र हैं।

Friday, February 5, 2010

मनोज बाजपेयी ब्लॉग: घातक है संकीर्ण राजनीति का विष

मनोज बाजपेयी ब्लॉग: घातक है संकीर्ण राजनीति का विष
बंधु आपने सही कहा, इस क्षेत्रीयता के खिलाफ सभी को आगे आना चाहिए और इस तरह की मानसिकता रखने वालों के खिलाफ मजबूती से खड़े होकर उनका मुकाबला करना होगा तभी इस देश की अखडंता को बरकरार रखा जा सकेगा।- अजीत शर्मा 9891400233

Friday, December 25, 2009

Auth Purushh Vaytha -1

प्रसिद्ध साहित्यकार अमर साहनी द्वारा रचित आलेखों का हम यहां क्रमवार प्रकाशन कर रहे हैं, जिनमें नारी वर्ग के प्रति बढ़ते अपराधों के लिए मात्र पुरुष वर्ग को दोषी ठहराया जाता है और पुरुष के स्पष्टीकरण की सुनवाई न तो कानून करता है और न ही समाज उसकी व्यथा और सच्चाई को जानने का प्रयास करता है। इन आलेखों में तसवीर का दूसरा रुख दर्शाया गया है और समाज में बढ़ रहे अपराध और विक्षिप्त वृतियों के मूल कारणों का उजागरीकरण किया गया है। - ब्लाग प्रबंधक


प्रस्तावना
इन दिनों महिलाओं की कथित दुर्दशा को लेकर राजनीति से लेकर साहित्य तक में खूब शोर-शराबा हो रहा है जिसे देखो हर छोटा-बड़ा राजनीतिज्ञ या लेखक महिलाओं की दशा का वर्णन इतने दर्दनाक तरीके से करता नजर आता है कि जिसे देख-सुनकर पत्थर भी आंसू बहाने लगता है। एक फैशन-सा बन गया है नारी की निरीहता और पुरुष की बर्बरता की घिनौनी तसवीर उभरकर सामने आती है जिसे देखकर संवेदनशील पुरुष भी अपने पुरुष होने पर शर्मसारी महसूस करता है। किन्तु क्या हमारे समाज में सच में नारी की यही दयनीय दशा है और पुरुष क्या दरिंदों से भी गया-बीता हो गया है, इसके निष्पक्ष और ईमानदाराना सर्वेक्षण की अत्यंत जरूरत है, नहीं तो आने वाले समय में पुरुष और नारी में इतना द्राव बढ़ जाएगा कि संभवत: सृष्टि के भविष्य पर ही प्रश्नचिंह लग जाए। नारी और पुरुष में दिन-प्रतिदिन बढ़ता दुराव और पनपती आपसी घृणा इसी प्रकार के प्रचार का परिणाम नजर आती है। इन हालात में बुद्धिजीवी वर्ग का यह अनिवार्य कर्तव्य बनता है कि बिना सस्ती शोहरत के लालच के ईमानदारी से समाज में नारी और पुरुष की सही स्थिति को सामने लाए। यदि बुद्धिजीवी वर्ग ने इस ओर समुचित ध्यान नहीं दिया तो फिर शायद किसी के पास पश्चाताप का भी समय नहीं रहेगा। नारी का नारी से विवाह करने की प्रथा और पुरुष का पुरुष के साथ ही जीवन निर्वाह करने की अभिलाषा का बढ़ता प्रचलन इस बात का खुला संकेत है कि समय रहते यदि नारी और पुरुष के बीच इस बढ़ती खाई को सजगता से न पाटा गया तो इसके भयानक परिणाम होंगे और हमारा यह समाज पतन के कितने गहरे गड्ढे में जाएगा इसका अनुमान लगा पाना भी सहज नहीं होगा। नारी की पक्षधर महिला लेखिकाएं और नारीवादी पुरुष लेखक नारियों की दुर्दशा के झूठे-सच्चे किस्से बयान करने में एक-दूसरे की होड़ में यह भूल गए हैं कि उनका यह कुप्रचार शायद उन्हें सस्ती लोकप्रियता तो दिला दे लेकिन उनके इस कृत्य से न तो नारी वर्ग का भला हो रहा है और न ही पुरुष वर्ग का कुछ बिगड़ या संवर रहा है। किसी जमाने में जिस प्रकार प्रगतिशीलता की लहर चली थी और हर छोटा-बड़ा लेखक स्वयं को प्रगतिशील सिद्ध करने के लिए निर्धन मजदूरों और किसानों के जीवन का इतना मर्मतात्मक चित्रण किया जाता था कि बस कुछ न पूछिये। उस जमाने में वही लेखक, कवि या शायर महान समझा जाता था जो अपने देश के गुणगान से ज्यादा रूस और चीन का गुणगान करते नजर आते थे। यही हाल आजकल महिला वर्ग के पक्षधर लेखक व लेखिकाओं का भी है जो भारतीय संस्कृति और पंरपराओं को गुलामी का कारण बताती हैं और पश्चिमी देशों की कथित महिला स्वतंत्रता की वकालत करते दिखाई देते हैं। प्रगतिशील लेखक-लेखिकाओं में से भी अधिकतर ने कभी किसी गांव में जाकर यह नहीं देखा कि खेतों में किसान किस अंदाज से हल चलाते हैं या मजदूर किसी मिल में किस तरह से कड़ी मेहनत करके अपने पसीने को दो जून की रोटी की शक्ल देते हैं। इस संदर्भ में उर्दू के प्रसिद्ध प्रगतिशील शायर जो नवाब परिवार से संबंध रखते थे, ने बड़ी ईमानदारी से स्वीकार किया था कि झोपडिय़ों में रहने वाले लोग महलों के ख्वाब देखते हैं मगर हम प्रगतिशील लेखक महलों में रहकर झोपडिय़ों के ख्वाब देखते हैं। कितना कड़वा सच उन्होंने बयान किया था। क्या नारी पक्षधर लेखकों में इतना साहस है कि वे इतनी ईमानदारी से स्वीकार कर सकें कि जो वे महिला का चित्र प्रस्तुत कर रहे हैं कि वह कितना झूठा और कितना सच्चा है। इस संदर्भ में मैं एक प्रसिद्ध उर्दू लेखिका जो महिलाओं की कट्टर पक्षधर अंजु दुआ 'जैमिनीÓ का जिक्र करना चाहूंगा कि उनका एक लेख 'पिटना औरत की नियती नहीं हैÓ आज से 8-10 साल पहले पढ़ा तो मैं आश्चर्यचकित रह गया कि मैं क्या इतना कूपमंठूप हूं कि मुझे अपने आसपास के माहौल का भी पता नहीं जहां औरत रोज पिटती है और मर्द हर रोज दो-एक बार दरिंदगी का चोला पहन लेता है। अंजु दुआ के लेख की इस अतिश्योक्तिपूर्ण को देखकर मुझे गुस्सा भी आया था और तभी से मेरे मन में था कि कभी उससे आमना-सामना हुआ तो जरूर पूछूंगा कि वह अपने इस लेख के बारे में कितनी ईमानदार है? इत्तेफाक से कुछ अरसा बाद उसका मेरा आमना-सामना हुआ तो मैंने उससे पूछा - क्या तुम्हारा पति तुम्हें रोज पीटता है? उसने चौंककर मेरी तरफ देखा था और बोली थी क्यों पूछ रहे हो? मैंने जवाब में उस लेख का हवाला दिया तो वह बोली - मेरा पति तो ऐसा नहीं करता क्योंकि वे तो मेरा बहुत सम्मान करते हैं। मैंने फिर पूछा क्या तुम्हारे ससुर का तुम्हारी सास के साथ ऐसा दुव्र्यवहार है? इस पर भी वह फौरन बोली - नहीं, वे दोनों तो बड़े प्यार से रहते हैं। मैंने फिर उसके आस-पड़ोस के बारे में कुरेदा तो भी उसका उत्तर नकारात्मक था। तो मैंने तेज आवाज में कहा कि फिर तुम्हें पिटना औरतों की नियति कहां से नजर आई? उसका दो टूक जवाब था साहनी साहब कभी झुग्गी-झोपडिय़ों में जाकर देखिये या कभी गांव का दौरा कीजिए तो आपकी आंखें खुल जाएंगी। मैंने बात बढ़ानी नहीं चाही और यह नहीं बताया कि मेरा देहातों से कितना संबंध रहा है और झुग्गी-झोपडिय़ों से कितना वास्ता पड़ा है। मैंने बात वहीं समाप्त करना बेहतर समझा। अंजु दुआ जैमिनी और उन जैसे अन्य रचनाकार अपने ढर्रे पर अडिग रहकर औरत को दयनीय पात्र और पुरुष को हिंसक दरिंदा और शोषक चित्रित करते हैं और पुरुष वर्ग के प्रति औरतों में नफरत का जहर फैलाने को उकसाते रहे और औरत को पुरुष के विरुद्ध मोर्चाबंदी करने की प्रेरणा देते रहे हैं। इन हालात को देखते हुए मैंने महसूस किया कि एक बुद्धिजीवी होने के नाते मेरा यह कर्तव्य बनता है कि मैं न केवल नगरों, महानगरों बल्कि झुग्गी-झोपड़ी और गांवों के जीवन का भी ईमानदारी से अध्ययन करूं और सच्चाई तक खुद पहुंचने के बाद उसे समाज के समक्ष औरत और पुरुष की वास्तविक स्थिति प्रस्तुत कर सकूं। मैं पिछले सात-आठ साल से इस विषय पर पौराणिक पुस्तकों, आधुनिक साहित्य का अध्ययन करने के साथ-साथ दूर-निकट की यात्राएं करके भी नारी-पुरुष के संबंधों को करीब से जानने-समझने का प्रयास किया है। उन्हीं प्रयासों का जो निष्कर्ष निकल पाया है उसे मैं प्रमाणों सहित आपके समक्ष प्रस्तुत करने का दुस्साहस कर रहा हूं, अब यह फैसला आप पर है कि यह बताएं कि नारी की कथित व्यापक दुर्दशा सही है और अगर है तो उसका जिम्मेदार पुरुष है या कहीं इसके लिए नारी ही तो दोषी नहीं है? यही नहीं आप यह भी ईमानदारी से बताएं कि कथित पुरुष प्रधान समाज में पुरुष की बेबसी के लिए कौन जिम्मेदार है?

Sunday, September 13, 2009

नुक्कड़ ब्लॉगर स्नेह महासम्मेलन संपन्न

संवाददाता/अजीत शर्मा

फरीदाबाद, 12 सितंबर।

साहित्य शिल्पी इंटरनेट पत्रिका का वार्षिकोत्सव एवं नुक्कड़ ब्लॉगर स्नेह महासम्मेलन आज यहां माडर्न स्कूल में विख्यात व्यंग्यकार और व्यंग्य यात्रा के संपादक डा. प्रेम जनमेजय की अध्यक्षता में देश के विभिन्न क्षेत्रों से पधारे ब्लागरों तथा गणमान्य साहित्यकारों की उपस्थिति में संपन्न हुआ। खचाखच भरे सभागार में डा. जनमेजय ने कहा कि साहित्य शिल्पी ने साहित्य के क्षेत्र में मानक तथा उपयोगी काम कर दिखाया है। यह साहित्य को व्यापकता देने वाला प्रयास है। इंटरनेट को अब गंभीरता से लिया जा रहा है। साहित्य में ब्लाग की बढ़ती भूमिका का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा कि हिन्दी ब्लागों की बढ़ती संख्या हिन्दी प्रेम को दर्शा रही है। समारोह एवं ब्लागर स्नेह महासम्मेलन का मुख्य अतिथि द्वारा दीप प्रज्जवलन से मां सरस्वती की वंदना से आरंभ हुआ। स्कूल की प्राचार्या नीलिमा जैन की उपस्थिति में साहित्य शिल्पी के संचालक राजीव रंजन प्रसाद की साहित्य शिल्पी के पिछले एक वर्ष के कार्यकलापों की रोचक मल्टीमीडिया प्रस्तुति ने मन मोह लिया। इस अवसर पर संपन्न काव्य गोष्ठी में दिनेश रघुवंशी, योगेंद्र मौदगिल, मीनाक्षी जिजीविषा, योगेश समदर्शी, विवेक बेनीवाल, अनिल बेताब, नमिता राकेश, वेद व्यथित, अब्दुल रहमान मंसूर, शोभा महेनू, बागी चाचा, वीरेन्द्र कंवर आदि अनेक कवि-कवियित्रियों ने कविता पाठ किया। नुक्कड़ के संचालक अविनाश वाचस्पति व कुनबा के संचालक अजीत शर्मा ने कहा कि इंटरनेट ने दुर्गम विश्व को एक सुंदर-सा आधुनिक गांव बना दिया है। इंसानों की भौगोलिक दूरियों से ज्यादा वैचारिक दूरियां होती हैं, ऐसी दूरियों को पाटने का काम जितनी खूबी से इंटरनेट कर रहा है, उसकी जितनी भी तारीफ की जाए कम है। कार्यक्रम में अनेक साहित्यकार तथा ब्लागर उपस्थित थे। ब्लॉगरों ने ब्लॉग पर व्यक्त विचारों को गंभीरता से लेने पर जोर दिया जबकि इसे डायरी मानने वाले ब्लॉगरों ने इसे अभिव्यक्ति का सच्चा माध्यम बतलाया। जिनमें, अभिषेक सागर, अजय यादव, हलद्वानी से शेफाली पांडेय, विनीत कुमार, पुष्कर पुष्प, मेरठ से इरशाद अली, लखनऊ से अमन यादव, अरूण अरोरा, सुरेश यादव, पवन चंदन, अजय कुमार झा, खुशदीप सहगल, सुलभ सतरंगी, विनोद कुमार पांडेय, राजीव तनेजा, सुनीता शानू इत्यादि ने अपने महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए। साहित्य शिल्पी के मोहिन्दर कुमार ने सबका धन्यवाद ज्ञापन किया।

Sunday, June 7, 2009

छात्रों पर हमले से ब्लाग जगत आहत

छात्रों पर हमले से ब्लाग जगत आहत
आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर लगातार हो रहे हमले की घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए जहां प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री केविन रूड से टेलीफोन पर बातचीत कर अपनी चिंता जाहिर की है, वहीं ब्लाग जगत भी अपने-अपने तरीके से 'नस्लीय' हमलों पर गुस्से का इजहार कर रहा है। आस्ट्रेलिया में पढ़ाई कर रहे कई छात्र भी ब्लाग के जरिए अपनी आपबीती लिख रहे है।
मेलबर्न में गत रविवार को भारतीय छात्रों द्वारा हमले के विरोध में निकाले गए शांति मार्च से लेकर वहां मौजूद भारतीयों की स्थिति पर इन दिनों ब्लाग जगत में खूब चर्चा हो रही है। 'ड्रीम्सटाइम' ब्लाग में आस्ट्रेलिया में पढ़ाई कर रहे एक छात्र की टिप्पणी है कि मैं मेलबर्न विश्वविद्यालय में पढ़ाई करता हूं। साथियों पर हो रहे हमले से मैं बेहद आहत हूं। मैंने मेलबर्न में इसी कारण शांति मार्च में हिस्सा लिया था।
ब्लाग में शांति मार्च से जुड़ी तस्वीरें भी लगाई गई है। 'सुरिंद' ब्लाग पर भारतीयों पर हो रहे हमलों पर सख्त टिप्पणी की गई है। इसमें कहा गया है कि आस्ट्रेलियाई सरकार और वहां की मीडिया भारतीयों पर हो रहे हमलों को गंभीरता से नहीं ले रही है।
एक अन्य ब्लाग में आस्ट्रेलिया के विदेश मंत्री स्टीफन स्मिथ के उस बयान पर टिप्पणी की गई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि देश में भारतीय छात्रों पर जारी हमला एक 'समस्या' है। उन्होंने आश्वासन भी दिया था कि आस्ट्रेलिया सरकार भारतीय छात्रों पर हो रहे हमलों को रोकने के लिए हर तरह का प्रयास करेगी।
स्मिथ ने आस्ट्रेलियाई समाचार चैनल 'नेटवर्क टेन' से कहा था कि भारतीय छात्रों पर जारी हमले एक समस्या है। हम भारतीयों की सुरक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठा रहे है।
इससे पहले गत शुक्रवार भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री केविन रूड से बात की थी और उनसे आस्ट्रेलिया में भारतीयों की सुरक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाने की अपील की थी। बालीवुड शहंशाह अमिताभ बच्चन ने भी अपने ब्लाग पर लिखा है कि मैंने आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर हुए हमलों के बारे में पूरे दिन इलेक्ट्रानिक मीडिया पर खबरे अफसोस और सदमे के साथ देखी।

Sunday, February 8, 2009

Surajkund Crafts Mela - Fashion Show

By Ajit Sharma

Surajkund, Feb 8 The visitors to the 23rd Surajkund Crafts Mela were treated to an exquisite and extravagant fashion show, 'Hemvati-Khajuraho', sponsored by the Surajkund Mela Authority and the Madhya Pradesh Tourism, on the lawns of Hotel Rajhans at Surajkund in Faridabad. Thirteen leading models were among those who sashayed down the ramp flaunting the wares designed by five leading names from the fashion space.

An official spokesman said here today that 'Hemvati-Khajuraho' constituted the muse and nymph of the traditional Madhya Pradesh costumes and handlooms. The fashion show was conducted against the backdrop of 'Sanchi Stupa', a World Heritage site in MP, where the relics of Buddha are kept. Blending folk elements with the traditions of the State, the fashion show used entire material exclusively from the Theme State of MP.

More than 100 persons belonging to MP participated in the fashion show with 13 leading models including Krishna Somani, Amanpreet Wahi, Tina Chatwal, Bharkha Kaul, Aanchal Oberoi, Montu Tomar, Ankita Jain, Ashita Joshi, Shipra Malik, Sahiba Singh, Anousha Chauhan, Himani Thappa and Shabnum Sultana of India. Five leading designers showcased their wares at this platform provided by the Surajkund Mela Authority and MP Tourism. The five designers of national fame were Poonam Bhagat, Charu Prashar, Ashima Singh, Gunjan and Rahul Jain, the spokesman added. The show was directed by Mr Naresh kapuria and choreographed by Ms Liza Varma.

The designers impressively used traditional embroidery, block printing, the dying art of bandhani, zari work on their creations and used the famous chanderi fabric for designing jackets, salwar kameez, silhouettes and other Indo-western outfits. The models sashayed down the ramp, clad in extravagantly designed clothes of bold patterns and brilliantly coloured fabrics, adorned with dramatic jewellery.

Poonam Bhagat's 'Taika'-Finnish for magic is 18 years old and still emerging on a large scale in the fashion arena. Known for using only natural hand woven fabrics that are indigenous to India, she has an ode to MP. She used only chanderi silks paired with black jersey, black diaphanous tunics, sheath dresses and churidar kurta have been burnished with copper and bronze tones using metal thread embroiders enhanced by chanderi tissue completes her creation of clothes.

Charu Prashar had been selected as the 'New Generation' designer by Fashion Design Council of India last year. She is constantly motivated towards taking the exotic Indian craftsmanship and ancient printing techniques to the highest levels of luxury. Her collection has been created keeping in mind the rich fabric resources and treatment techniques which originated from MP. The influence of block printing is quite evident in this collection and the choices of woven fabric are Chanderis, Maheshwari along with kosa silk and pure cotton. The interesting fact about these woven fabrics is that the weavers in both Chanderi and Maheswari are Muslims, while Hindus take on the trading, truly creating the symphony of Creative Unity. Printing being her signature style is quite evident in this collection too. She has used block printing which is India's age old heritage and India's gift to the world of fashion. She has developed beautiful motifs which have been specially hand crafted and hand printed on the garments. Woven textiles chanderi's and mashewari's have also been used in ornamenting the ensembles. The colours are very basic and soothing and peaceful like whites and creams.

Ashima Singh Collection captures women's glamour, women desire to focus on life's essentials, there taste for anachronisms as well as independence of sprit. This is what prompts Ashima to personalize the fashion she loves to wear, always projecting the strong and the feminine side of women. The name of her collection is "Sonnet". Season- spring and summer 2009. The collection is a cheerful song designed to take us away from the everyday headlines, routines and mundane chores. Styles exhibit an experimentative approach, retaining simplicity and elegance while using traditional handcrafted details eclectic mix of vibrant and muted tones in silks, chiffon, blouses, wide-legged pants, maxi dresses with details of multicolored chains, sequins, ruffles pleating and hand embroideries.

Rahul and Gunjan it is the embodiment and the soul of the magnificence of India's traditional arts and crafts, which they have sought to bring to their exquisite collection.Chanderi has been an eternally favorite with Rahul and Gunjan and every season their collection has this has this fabric in some or the other character. This fabric from the heart of the county is close to their heart too. In the past seasons the designer duo has innovated with this versatile fabric by way of inducing silk strips and lines yarns with silk warp, cashing on the transparency of the fabric by underlay of sequins and silk patches and layered patch work in subtle contrast. The collection presented here shows the expanse of their work with this wonderful medium called Chanderi.

Besides 19 folk dancers of MP, a group of five dancers belonging to the famous Indian Festival Group and ten drummers of the Kalakar Trust, New Delhi, performed at the fashion show, lighting up the atmosphere and making the audience drop their jaws. Painters Natasha and Suchi painted on the theme of Khajuroa and created the best suited ambience of the heritage of MP.

The Haryana Minister of State, Mrs Kiran Choudhry after lighting the inaugural lamp said that the Surajkund crafts fair provided a good platform to master craftsmen of the country to display their finest handlooms and handicrafts. The President of India, Mrs Pratibha Devisingh Patil, had inaugurated the 23rd Surajkund Crafts Mela in the presence of the Union Minister of Tourism, Mrs Ambika Soni, and Tourism Minister of Madhya Pradesh, Mr Tukoji Rao Puar. The fashion show was organized especially to showcase the rich traditions of textiles, crafts and styles of the Theme State participating in the Mela, said Mrs Choudhary.

Also present on this occasion were Additional Principal Secretary, Mr Chattar Singh, Commisoner and Secretary, Haryana Tourism, Mrs Keshani Anand Arora, Managing Director Haryana Tourism Mrs Satwanti Ahlawat, Managing Director MP Tourism Mr Ashwani Lohani and other officers of Haryana and Madhya Pradesh Government.

Sunday, February 1, 2009

Suraj Kund Hasatshilp Mela-2009 Open

Kiran Choudary ke saath Ambika soni
Smt. Partibha Patil Hastkala dekhate hue.




Mele main saji-dhaji kalakar



Mahapor ke sath kiran va partibha




Surender Singh ke yaade





Simarti Chinh














Mele ka udhghatan karti President








Sunday, January 11, 2009

लेख मिला



आज ही यह लेख मिला जो हुबहू यहाँ पर्स्तुत है

Tuesday, December 30, 2008

नए साल का पहला दिन

आज साल का पहला दिन सुबह से ही मित्रों, परिचितों व रिश्तेदारों की बधाइयाँ सविकारने और उनेह देने के साथ शुरू हुआ। अब सभी ये जानने के लिए उत्सुक है की साल २००८ की तरह २००९ भी मंदी की चपेट में रहेगा क्या ? अब ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा की ये साल कैसा रहता है वैसे हमारे पर्धन्मत्री और उनके मंत्री यह पहले ही कह चुके हैं की अगले १८ महीने देश को और मंदी से जूझना पड़ेगा।

वैसे देश ने गुजरे साल में भी खूब तरक्की की है यह किसी से छुपा नही है और देश में धनकुबेरों की बाढ़ सी आ गयी है और देश के धन्कुबर अपनी पत्नी को महंगे हवाई जहाज तक जन्म्दीन के तोहफे में दे रहे हैं। ये अलग बात है की देश की अधिकांश जनता इस ठिठुरती सर्दी में बिना गर्म कपडों के सिकुड़ने को मजबूर है।

नए साल २००९ में इन गरीबों के हालात कैसे रहते हैं यह भविशेय के गर्भ मैं है.

नव वर्ष २००९ की हार्दिक बधाई

Friday, December 26, 2008

अलिवदा 2008

वर्ष 2008 भारत के लिए काफी उतार चढाव भरा रहा. इसी साल देश ने चन्द्रयान भी भेजा और अभिनव बिन्द्रा ने स्वर्ण पर निशाना भी साधा. वहीं बडे शहरों में धमाके होते रहे और मुम्बई पर देश का सबसेबड़ा हमला भी हुआ, जिसको आज पुट्स एअक महिना हो गया, वहीं शेयर बाजार ने भी गहरा गोता लगाया और देश वैश्विक मंदी की चपेट में भी आया.

Wednesday, December 24, 2008

Very MERRY CHRISTMAS

Wish you All A Very MERRY CHRISTMAS

Monday, December 22, 2008

आतंक का सफाया जरूरी है

आज देश में चारों तरफ़ आतन्कवाद पर चर्चा हो रही है और हर कोई अपने तरीके से इससे निपटने के तरीके बता रहे हैं; कोई पड़ोसी देश पर सीधा हमला बोलने को कह रहा है तो कोई कुटनीतिक तरीके। लेकिन मेरा मन्ना है की आतंकवाद से निपटने के लिए पहले देश और देश के बहार बैठे उनके कुछ तथाकथित आकाओं से लोहा लेना होगा जिनकी मदद से ये हमारे प्यारे देश में घुसपैठ कर पाने में सफल हो जाते है। देश के राजनेताओं को अब अपने वोट बैंक के बजाये लोकहित में इन अमन के दुश्मनों से डटकर मुकाबला करना ही होगा चाहे इसके लिए हमें विश्व समुदाय से भी क्यों न टकराना पड़े।

जब अमेरिका अपने ऊपर हुई आतंकवादी घटना के बाद अफगान और इराक पर सीधी कार्यवाही कर सकता है तो अब जब हमारे ऊपर उसी तरह का आतंकी हमला हुआ है तो विशव समुदाय हमें कैसे रोक सकता है, और इस पर अमल के लिए हमारे विदेश मंत्री और रक्षः मंत्री ने बोल भी दिया है, अब देखते है हमारी सरकार क्या कार्यवाही करती है.
Ajit sharma